| Jan 01, 1970 | Daily Report |
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20681. गढ़वाल: लॉकडाउन में घर लौटे आशीष ने शुरू किया पशुपालन, बेहतर कल की उम्मीद
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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Self -Reliance
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India
Railway Gazette
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- हम टिहरी गढ़वाल के एक ऐसे ही युवा के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जो दौरान अपनी नौकरी से हाथ धो बैठा और वापस अपने गांव की ओर आ गया। गांव आकर उसने स्वरोजगार के पथ पर चलने का निर्णय लिया और अनोखी मिसाल पेश की। बात कर रहे हैं थौलदार ब्लॉक के तिवार गांव के आशीष डंगवाल की।
- आशीष एक युवा प्रवासी है जो हाल ही में अपने गांव तिवार लौट आए हैं। वे सिंगापुर के एक होटल में शेफ का काम करते थे। लेकिन दुर्भाग्यवश कोरोना वायरस ने उनकी नौकरी छीन ली। गांव वापस लौटे तो परिवार की पालन पोषण की चिंता सताने लगी। आशीष डंगवाल के माता-पिता काफी समय पहले गुजर चुके हैं। उनके घर में उनके दिव्यांग भाई और भाभी हैं जिनकी देखभाल की जिम्मेदारी आशीष के कंधों के ऊपर ही है।
- ऐसे में आत्मविश्वास और हिम्मत की बहुत जरूरत होती है। उन्होंने हिम्मत जुटाई, मनोबल मजबूत किया और स्वरोजगार का पथ अपनाया। उन्होंने अपने घर पर ही पशु पालन करते हुए एक दर्जन बकरियां 6 मुर्गियां और एक गाय के जरिए अपना पशुपालन का काम शुरू किया। इस समय आशीष पशुपालन के जरिए अपने दिव्यांग भाई भाभी और अपना पेट पाल रहे हैं। उनकी देखादेखी गांव के अन्य युवाओं ने भी स्वरोजगार के पथ पर चलने की ठानी है। आशीष पशुपालन के जरिए न केवल अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं बल्कि कई युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनकर सामने आए हैं। जरूरत है कि गांव पहुंचे अधिक से अधिक युवा स्वरोजगार को अपनाएं ताकि भविष्य में उनको किसी भी प्रकार की आर्थिक समस्या न हो।
20682. होटल की नौकरी छूटी तो लौटे गाँव, मिट्टी का ओवन बनाकर शुरू किया अपना पिज़्ज़ा आउटलेट!
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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The Better India
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- हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के सनाही गाँव के रहने वाले दो चचेरे भाई, विपिन कुमार शर्मा और ललित कुमार शर्मा पिछले कई बरसों से होटल इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं। गाँव में ही स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, विपिन नौकरी की तलाश में दिल्ली पहुँच गए। वहां उन्होंने पहले तो छोटी-मोटी नौकरियां की और फिर साल 1997 में ओबरॉय होटल से जुड़ गए। उनकी शुरुआत काफी छोटे पद से हुई लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने चीजें सीखीं और इतने सालों में खुद को मैनेजमेंट लेवल तक पहुँचाया। अपने करियर में विपिन ने भारत के बाहर मालदीव जैसे देशों में भी होटल व रिसोर्ट के साथ काम किया है।
- वह बताते हैं, “मैंने अपने करियर में कई जॉब बदलीं। एक होटल के बाद दूसरे होटल, फिर बड़े-बड़े रिसोर्ट आदि के साथ काम किया। इस बीच दो-तीन बार एक-एक साल का ब्रेक लेकर घर-परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी निभाई। मेरा परिवार हमेशा गाँव में ही रहा। हमारी थोड़ी-बहुत ज़मीन है जिसे पहले पिताजी देखते थे। लेकिन उनके देहांत के बाद यह सब ज़िम्मेदारी भी हम पर आ गईं।”
- लॉकडाउन में लौटे घर: साल 2019 के अंत में ही उन्होंने रोजवुड होटल्स की चेन को ज्वाइन किया था और वहां उनके एक नए होटल में बतौर डायरेक्टर नियुक्त हुए थे। लेकिन मार्च 2020 में उन्हें कोविड-19 के चलते भारत वापस लौटना पड़ा। वहीं, दूसरी तरफ उनके चचेरे भाई, ललित कुमार शर्मा ने साल 2003 में होटल इंडस्ट्री में अपना करियर शुरू किया। वह किचन में शेफ के साथ काम करते थे। ललित कहते हैं कि इतने सालों में उन्होंने भारत के अच्छे नामी होटल्स के साथ-साथ बाहर चीन जैसे देशों में भी काफी समय तक काम किया है।
20683. कोरोनावायरस ने मुंह की खाई, श्रमिक से मालिक बन गए दो भाई
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Dainik Jagran
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- उत्तरकाशी कोरोना काल में हरियाणा से बेरोजगार होकर लौटे हरदोई, उप्र के दो भाइयों ने गांव में अपना कारोबार खड़ा कर दिया। शहर में खुद फैक्ट्री में काम कर रोजी पा रहे थे, लेकिन लॉकडाउन में काम छिन गया तो गांव आकर न केवल खुद को मजबूत किया, बल्कि गांव लौटे प्रवासियों को भी रोजगार से जोड़ा। लॉकडाउन में जब लोग काम के लिए परेशान थे, उसी दौरान उन्होंने बंद पड़ी अपनी बेकरी को चालू कर नई शुरुआत की।
- अब धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ता जा रहा है, जिसमें लोग जुड़ते जा रहे हैं। हरदोई की सवायजपुर तहसील क्षेत्र के मत्तीपुर गांव निवासी अवधेश सिंह नहीं चाहते थे कि उनके बेटे कुलदीप और शिवम परदेस में नौकरी करने जाएं। लेकिन गांव में रोजगार की कमी के चलते वर्ष 2017 में दोनों बेटे हरियाणा चले गए।
- वहां बल्लभगढ़ में पंखा बनाने वाली फैक्ट्री में काम करने लगे। दिन में काम और बचे हुए समय में कमर्शियल वाहन चलाकर जीविका चलाते थे। बेटों को गांव बुलाने के लिए अवधेश सिंह ने 2019 में गांव में ही बेकरी खोली। लेकिन दोनों नहीं आए। क्षेत्र में कोई बेकरी नहीं थी, जिसके चलते ब्रेड, रस्क, बिस्कुट आदि की मांग तो थी।
20684. आत्मनिर्भरता – सिलाई से संवारी जिंदगी
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VSK Bharat
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- पटना (विसंकें). कोरोना ने पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है. कई लोगों की नौकरी छूट गई तो कई के आशियाना बिखर गए. व्यवसाय चौपट हो गया. ऐसे संकट के समय में कुछ लोग बेसहारा के सहारा बने. ऐसी ही एक महिला हैं – दरभंगा की मधु सरावगी. मधु ने लगभग 300 महिलाओं को रोजगार देने का काम किया है. कोरोना की शुरुआत हुई तो मास्क सिलाई का काम शुरू हुआ. अब महिलाएं और लड़कियां रेडीमेड कपड़े बनाने के साथ बुटीक का भी काम करती हैं.
- मधु सरावगी का अपना सिलाई संस्थान है. पिछले 5 वर्षों से अपने यहां से बने कपड़े स्थानीय बाजार में देती थीं. इसके अलावा अपने संस्थान में 25 महिलाओं को प्रशिक्षण के बाद रोजगार भी दिया. कोरोना के कारण जब लॉकडाउन लगा तो लोगों के सामने आर्थिक दिक्कतें आ गई. मास्क अनिवार्य तो था, लेकिन बाजार में उसकी कमी थी. ऐसे में मधु ने बेरोजगार महिलाओं के लिए कार्य प्रारंभ किया. थोड़े प्रशिक्षण के बाद उन्हें मास्क बनाने का काम दिया. प्रत्येक मास्क पर 2 रुपये देने लगीं. एक महिला घर के काम निपटा कर 80 से 100 मास्क बना लेती.
- ऐसे 300 महिलाओं को इस काम में जोड़ा. जिन महिलाओं के पास सिलाई मशीन नहीं थी, उन्हें मशीन उपलब्ध करवाई. अब तक ये महिलाएं चार लाख से अधिक मास्क बना चुकी हैं. इसके अलावा सिलाई के अन्य काम भी करती हैं. इससे प्रतिदिन 300 से लेकर 500 रुपये कमा लेती हैं. अधिकतर महिलाएं घर से काम करती हैं. अब तो इन महिलाओं से कपड़े सिलवाने ग्राहक खुद इनके घर तक आ जाते हैं.
20685. Farmers’ field-to-Mumbai business grows to 480 members, bears Rs 3 crore fruit
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Agriculture(Organic Farming)
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India
The Times Of India
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- A casual phone chat and a farmer’s quick thinking have turned fortunes for several agriculturists in the state, and what once seemed like a mega crisis has been converted into an opportunity to generate business worth Rs 2.75 crore in just over three months.
- Soon after the Covid lockdown was announced in March, farmer Manish More from Otur village in Pune district feared the vegetable crop standing in his field would go unsold.
- Farmer Manish More, who is part of a WhatsApp group of farmers from various districts, was discussing ways to deliver their produce to cities, a relative called up from Mumbai. “He told me of a scarcity of vegetables in the city,” More said.
20686. गांव में लाउडस्पीकर लगाया, मोहल्लों में जाकर पढ़ातेे हैं बच्चों को
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Innovative ideas
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Dainik Bhaskar
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- लाखीमार धरमजयगढ़ से 52 किलोमीटर घने जंगलों से घिरा हाथी प्रभावित गांव है। गांव के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक निरंजन पटेल ने जब गांव में नेटवर्क की समस्या देखी तो लाउडस्पीकर और मोहल्लों में ब्लैक बोर्ड लगाकर पढ़ाई शुरू कराई। उन्होंने गिनती, पहाड़ा, 12 खड़ी, स्वर व्यंजन, कविता, हिन्दी और अंग्रेजी के अल्फाबेट के फ्लैक्स बनवाकर अलग-अलग मोहल्लों में लगवा दिए हैं।
- गांव में जो शिक्षित युवा हैं उन्हें भी प्राइमरी स्कूल के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। वे पंचायत के चबूतरे और घरों के बाहर बरामदे में पांच-छह बच्चों को डिस्टेंसिंग के साथ पढ़ाते हैं।
- जिले में स्कूल के साथ ही कॉलेज के कुछ प्रोफेसर भी बदले युग में ऑनलाइन शिक्षा में लीक से हटकर काम कर रहे हैं। खरसिया में सरकारी कॉलेज में सिलेबस को पूरा करने के लिए आरके टंडन समेत 10 प्राध्यापकों ने स्टूडेंट्स को जूम एप, वे बेक्स जैसे एप से जोड़ा है ।
20687. हौसला था ..और रेत में बसाया खुशियों का चमन, हरियाणा के किसान ने लिखी कामयाबी की नई कहानी
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Dainik Jagran
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- राहुल दहिया ने कृषि विशेषज्ञों से राय ली और उनकी सलाह लेकर रेतीली जमीन के अनुकूल बागवानी शुरू कर दी। हौसले की पीठ पर मेहनत रंग लाई। दो एकड़ जमीन में अमरूद का बाग भी लगाया था। अमरूद के बाग से आय हुई। फिर आडू का बाग लगाया। इसके बाद राहुल के दिन फिरने शुरू हुए। अब तो खेत में सेब, नासपाती, बादाम, अंगूर सहित अनेक पौधे लगाए हुए हैं। इनके फल आ रहे हैं।
- लाभ की जगह हानि देख खुद की नसर्री तैयार कर दी। अब खुद की नर्सरी में 40 से अधिक प्रकार के फलों के पौधे हैं।
- उनकी श्री बालाजी नर्सरी एवं चेयरमैन फ्रूट फार्म दहमान के नाम से संचालित नर्सरी को गत वर्ष राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से मान्यता मिल गई।
20688. मंदिर, मजारों से निकलने वाली राख से मूर्तियां बना रहे, दो साल में कैदियों की मदद से करोड़ों का बिजनेस खड़ा किया
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Self -Reliance
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Dainik Bhaskar
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- यूपी के खाजपुर गांव के 20 वर्षीय आकाश सिंह ने दो साल में सैकड़ों कैदियों की जिंदगी बदली है।
- हर महीने दिल्ली-एनसीआर के 160 मंदिर-मजारों से करीब 8 हजार किलो राख और नारियल का कचरा जुटाते हैं
- इनसे जेल में बंद कैदी मूर्तियां तैयार करते हैं, नदी-तालाबों को मंदिर की राख से बचाने के लिए निकाला तरीका
20689. MBA कर किसान पिता के साथ गुड़ बनाने लगा यह बेटा, अब 100 किसानों तक पहुँच रहा है फायदा
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The Better India
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- हमारे देश में गुड़ को प्राकृतिक मिठाई के तौर पर जाना जाता है। यह स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक गुणों से भी परिपूर्ण है। यही वजह है कि यह सदियों से भारतीय खान-पान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन बीते कुछ वर्षों के दौरान चीनी मिलों की संख्या बढ़ने के कारण इसका उत्पादन काफी प्रभावित हुआ है। इन्हीं चुनौतियों के बीच एक युवा किसान ने आधुनिक विधि से गुड़ बनाकर लाभ कमाने का एक नायाब तरीका ढूंढ़ा है।
- अपनी यूनिट में गन्ने की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सोहन 100 से अधिक स्थानीय गन्ना किसानों से जुड़े हुए हैं।
- सोहन अपने गुड़ प्रोसेसिंग यूनिट को सितंबर से अप्रैल तक चलाते हैं। उनकी यूनिट में प्रति घंटे 120 किलो गुड़ का उत्पादन होता है, जबकि हर साल 1200 क्विंटल गुड़ का उत्पादन होता है। वह अपने उत्पादों को खुदरे तौर पर स्थानीय बाजार में, और सौ किलो के थोक भाव पर, घर से 8 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर मंडी में बेचते हैं। इससे सोहन को हर नौ महीने में 10 लाख रुपए की आय होती है, जिसमें उन्हें लगभग डेढ़ लाख रुपए की बचत होती है।
20690. जैविक दाल, मसालों से लेकर रागी की आइस-क्रीम तक, स्वदेशी को बढ़ावा दे रहा है यह युवक
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- जेएसएस नेचर फूड्स स्टार्टअप की ब्रांड आद्यम ग्राहकों को पौष्टिक अनाजों से बनी आइसक्रीम भी खिला रहा है। आइसक्रीम के साथ-साथ आद्यम पारंपरिक तरीकों से बने मसाले और रागी जैसे मिलेट्स से बनी सेवैयाँ और नूडल्स भी बना कर बेच रहा है।
- 32 वर्षीय भार्गव आर. ने पिछले साल आद्यम की नींव रखी और आज वह कोयम्बटूर से बाहर भी एक अच्छी पहचान बना चुके हैं।
- आद्यम ब्रांड के अंतर्गत, आज वह सभी तरह के मसाले, 9 तरह के अनाजों की सेवैयां (बिना किसी मैदे के इस्तेमाल से बनी), नूडल्स, शुद्ध जंगली शहद, और मिलेट्स से बनी आइसक्रीम बेच रहे हैं।